सोहराबुद्दीन केस का मकसद बताने में असफल रही सीबीआई: अदालत

मुंबई

सीबीआई अदालत ने कहा कि सोहराबुद्दीन फर्जी एनकाउंटर सीबीआई का एक ऐसा मामला था जिसके राजनीतिक और आर्थिक लाभ दोनों ही उद्देश्‍य थे। कोर्ट का विस्‍तृत आदेश सोमवार को जारी किया गया। अदालत ने जोर देकर कहा कि सीबीआई ने कुछ कॉल डेटा रिकॉर्ड और अन्‍य रिपोर्ट को छिपाकर रखा जो इस मामले में ठीक नहीं था।

'गवाहों को प्रभावित करने के आरोप साबित नहीं'
अपने आदेश में कोर्ट ने अंतिम गवाह के साक्ष्‍य की तरफ ध्‍यान दिलाया और कहा कि अपराधी नेताओं के साठगांठ के बारे में उनका बयान 'अप्रासंगिक और महत्‍वहीन है।' अदालत ने कहा, 'अपने पहले के (बयान में) लगभग सभी गवाहों ने नेताओं और राजनीतिक साठगांठ के बारे में कुछ भी नहीं कहा था लेकिन बाद के वर्षों में वे किसी तरह से साठगांठ की कहानी लेकर आ गए…. हालांकि अभियोजन पक्ष ने प्रयास किया लेकिन वह नेताओं और पुलिस के बीच साठगांठ को साबित करने में असफल रहा।'

अदालत ने यह भी कहा कि 50 लाख रुपये लेकर सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दायर एक याचिका को वापस लेने के लिए गवाहों को प्रभावित करने के आरोप को भी साबित नहीं किया जा सका। आदेश में कोर्ट ने कहा, 'इसी तरह से ऐसा कोई साक्ष्‍य नहीं है जिससे पहली नजर में नेताओं द्वारा राजस्‍थान के मार्बल लॉबी से उगाही की बात को साबित किया जा सके जिन्‍हें शुरू में सीबीआई के जांचकर्ताओं ने दोषी ठहराया था।'

'कोई संतोषजनक सबूत नहीं मिला'
सीबीआई कोर्ट ने कहा कि ऐसे में आरोपी बरी होने के हकदार हैं। बता दें कि सोहराबुद्दीन केस में सीबीआई की विशेष अदालत ने सभी 22 आरोपियों को बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा था कि सबूतों अभाव में आरोपियों को मामले से रिहा किया जाता है। कोर्ट ने गवाहों के बयान से पलटने पर यह भी कहा कि अगर कोई बयान न दे तो इसमें पुलिस की गलती नहीं है। सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर मामले में स्पेशल सीबीआई जज ने अपने आदेश में कहा कि सभी गवाह और सबूत साजिश और हत्या को साबित करने के लिए काफी नहीं थे।

कोर्ट ने यह भी कहा कि मामले से जुड़े परिस्थितिजन्य सबूत भी पर्याप्त नहीं है। सीबीआई कोर्ट के अनुसार, 'तुलसीराम प्रजापति को एक साजिश के तहत मारा गया, यह आरोप भी सही नहीं है।' सीबीआई कोर्ट के जज ने कहा, 'सरकारी मशीनरी और अभियोजन पक्ष ने काफी प्रयास किया और 210 गवाहों को सामने लाया गया लेकिन उनसे कोई संतोषजनक सबूत नहीं मिल पाया और कई गवाह अपने बयान से पलट गए। इसमें अभियोजक की कोई गलती नहीं है अगर गवाह नहीं बोलते हैं।'

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