24 मासूमों की मौत का राज: 11 सितंबर को ही मिल गई थी खतरे की घंटी, डॉक्टर की लापरवाही ने बढ़ाया त्रासदी का आकार

जहरीले कफ सिरप ‘कोल्ड्रिफ’ से हुई 24 बच्चों की मौत की जाँच में, लापरवाही और अनदेखी की चौंकाने वाली परतें खुली हैं। यह सामने आया है कि परासिया के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रवीण सोनी को नागपुर के एक वरिष्ठ डॉक्टर ने 11 सितंबर 2025 को ही सिरप में ज़हर होने का अंदेशा जताते हुए जाँच कराने की सख्त सलाह दी थी, जिसे उन्होंने पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया।

विशेषज्ञ ने दिया था ‘DEG’ का संकेत:

नागपुर स्थित आस्था चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल के प्रमुख डॉ. प्रवीण खापेकर ने बताया कि सितंबर के शुरुआती दिनों में ही परासिया से आ रहे वायरल पीड़ित बच्चों की किडनी 3 से 5 दिन के सामान्य इलाज में फेल हो रही थी। एक पुराने अनुभव के आधार पर उन्हें यह समझते देर नहीं लगी कि यह स्थिति केवल कफ सिरप में डाइथिलीन ग्लाइकोल (DEG) की अत्यधिक मात्रा के कारण ही हो सकती है। 11 सितंबर को उन्होंने सीधे डॉ. सोनी को फोन कर सिरप की जाँच करवाने और प्रशासन को सूचित करने की हिदायत दी थी।

डॉ. सोनी का तर्क: दवा नहीं, ‘पानी’ दूषित:

पीड़ित बच्चे वेदांश के पिता कपिल पवाँर ने खुलासा किया कि डॉ. खापेकर के फोन के बावजूद, डॉ. सोनी ने अपनी दवा के बजाय पानी को दोषी ठहराया। डॉ. सोनी ने तर्क दिया कि रिधौरा और उमरेठ में किसानों द्वारा अत्यधिक पेस्टीसाइड के उपयोग से पानी दूषित हो रहा है, जिससे बच्चों की किडनी फेल हो रही हैं। इस बहाने के बाद डॉ. सोनी ने 24 सितंबर तक बच्चों को ‘कोल्ड्रिफ’ सिरप प्रिस्क्राइब करना जारी रखा।

प्रशासनिक और डॉक्टरी लापरवाही की श्रृंखला:

जाँच में पता चला कि डॉ. सोनी 1 से 24 सितंबर तक अस्पताल से लंबी छुट्टी लेकर अपने घर पर प्राइवेट प्रैक्टिस कर रहे थे। इतना ही नहीं, नागपुर के एक नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. योगेश टेंभेकर ने 16 सितंबर को ही बच्चों की किडनी फेलियर की रिपोर्ट डिस्ट्रिक्ट हेल्थ ऑफीसर (DHO) को भेजी थी, लेकिन सीएमएचओ कार्यालय के अफसरों ने इस रिपोर्ट की अनदेखी कर दी। इस प्रशासनिक सुस्ती के कारण, डॉ. अमन सिद्दीकी और डॉ. अमित ठाकुर जैसे अन्य डॉक्टर भी 24 सितंबर तक बच्चों को जानलेवा सिरप लिखते रहे, जिससे त्रासदी का दायरा बढ़ता गया।