जेब तंग, दिल बड़ा”: ₹5.20 करोड़ के मंगेश यादव की कहानी; ग्राउंड्समैन को दे दिया था ₹10,000 का अवॉर्ड।

छिंदवाड़ा। छिंदवाड़ा-पांढुर्णा अंचल के बोरगांव निवासी 22 वर्षीय युवा क्रिकेटर मंगेश यादव का IPL सपना साकार होने के बाद उनके घर पर उत्सव जैसा माहौल है। रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर (RCB) ने उन्हें ₹5 करोड़ 20 लाख की भारी भरकम राशि में खरीदकर टीम में शामिल किया है। मंगेश के पिता, राम अवध यादव, एक ट्रक ड्राइवर हैं, और माँ गृहिणी हैं। उनके संघर्ष से मिली इस सफलता पर परिवार और क्षेत्रवासी आतिशबाजी चलाकर और मुंह मीठा करके खुशियां मना रहे हैं। इंदिरा गांधी क्रिकेट मैदान से अपने खेल की नींव रखने वाले मंगेश की यह कहानी उनके अटूट जुनून और दृढ़ संकल्प का प्रमाण है।

इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर राजनीतिक गलियारों से भी उन्हें शुभकामनाएं मिली हैं। छिंदवाड़ा-पांढुर्णा के पूर्व सांसद नकुलनाथ ने विशेष रूप से मंगेश की माँ को फोन कर हार्दिक बधाई दी। वहीं, सांसद विवेक बंटी साहू ने भी X (ट्विटर) के माध्यम से बधाई संदेश प्रेषित किया। इस प्रकार, मंगेश को जिले के दोनों प्रमुख राजनीतिक प्रतिनिधियों का आशीर्वाद प्राप्त हुआ है।

मंगेश के कोच उत्सव बैरागी बताते हैं कि मंगेश ने कम संसाधनों के बावजूद हमेशा बड़ा दिल दिखाया। उन्होंने सांसद क्रिकेट टूर्नामेंट में मिली साइकिल और 10 हजार रुपए की पुरस्कार राशि ग्राउंड्समैन को देकर अपनी महानता साबित की थी। कोच बैरागी ने बताया कि मंगेश हमेशा कहते थे, “मैं एक दिन कुछ बड़ा करूंगा।” आज ₹5.20 करोड़ की बोली के साथ, उन्होंने न केवल अपना वादा पूरा किया है, बल्कि पूरे छिंदवाड़ा–पांढुर्णा जिले का नाम राष्ट्रीय मंच पर रोशन किया है। यह सफलता आने वाली पीढ़ियों के खिलाड़ियों के लिए एक सच्ची प्रेरणा बनेगी।

मंगेश के पिता बोले मैं लोगों का हमेशा आभारी रहूंगा

मंगेश के पिता राम अवध यादव ने कहा कि आज जब पूरा बोरगांव इतना खुश है, तो एक मां-बाप को इससे ज्यादा और क्या चाहिए? मंगेश की खुशी का ठिकाना नहीं है और उसकी छोटी बहन पायल भी बहुत खुश है।

मंगेश ने क्रिकेटर बनने की ठान ली थी और वह अपने ढंग से जी-जान लगाकर मेहनत करता रहा। सच तो यह है कि हम ही लोग पीछे हट रहे थे, लेकिन वह अपने परिश्रम में लगा रहा। हमारे पीछे हटने की अपनी मजबूरी थी; हमारे पास इतना पैसा या बैंक बैलेंस नहीं था कि उसे पूरा सहयोग दे सकें। जो मजबूरी है, उसे बोलने में कैसी झिझक? घर की जिम्मेदारियां भी थीं और जैसे-तैसे सब चल रहा था।

बीच में मैं आर्थिक रूप से पूरी तरह टूट गया था, लेकिन तभी हमें ‘त्रिमूर्ति’ मिल गए। उन्होंने ऐसा सपोर्ट किया जिससे मंगेश को उसका मुकाम मिल गया। मैं उनका हमेशा आभारी रहूंगा।”